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Religion

Jagannath Rath Yatra 2026 आज से शुरू हुई आस्था की सबसे भव्य यात्रा

भक्ति परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम

Last updated: जुलाई 16, 2026 3:46 अपराह्न
By Divisha 2 महीना पहले
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6 Min Read
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भगवान Jagannath की विश्व प्रसिद्ध Jagannath Rath Yatra 2026 का शुभारंभ आज 16 जुलाई से ओडिशा के पुरी में हो गया। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन निकलने वाली यह यात्रा भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। लाखों श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा में शामिल होकर रथ खींचते हैं और भगवान के दर्शन करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस यात्रा में शामिल होने या रथ के दर्शन मात्र से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। इस वर्ष भी देश विदेश से लाखों श्रद्धालुओं के पुरी पहुंचने की उम्मीद है।

Jagannath Rath Yatra का धार्मिक महत्व

सनातन परंपरा में Jagannath रथ यात्रा का विशेष स्थान है। भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। वर्ष में केवल एक बार ऐसा अवसर आता है जब भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस यात्रा को भगवान और भक्त के मिलन का उत्सव भी कहा जाता है। यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि समानता, सेवा और मानवता का संदेश भी देती है क्योंकि इसमें जाति, वर्ग और धर्म का कोई भेदभाव नहीं माना जाता।

आखिर क्यों निकलती है भगवान की रथ यात्रा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। यह मंदिर श्रीमंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित है। भगवान यहां कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं और इसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। इस पूरी यात्रा को भगवान के प्रेम, करुणा और भक्तों के प्रति स्नेह का प्रतीक माना जाता है।

हर वर्ष नए बनाए जाते हैं तीनों रथ

जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है कि तीनों रथ हर साल नई लकड़ी से बनाए जाते हैं। पुराने रथों का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता। पारंपरिक कारीगर पीढ़ियों से इस कार्य को करते आ रहे हैं और निर्धारित नियमों के अनुसार रथों का निर्माण करते हैं।

भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष कहलाता है।

बलभद्र का रथ तालध्वज कहलाता है।

सुभद्रा का रथ दर्पदलन या देवदलन कहलाता है।

तीनों रथों का आकार, ऊंचाई, पहियों की संख्या और सजावट अलग अलग होती है तथा इन्हें विशेष धार्मिक विधि के साथ तैयार किया जाता है।

रथ खींचने की परंपरा क्यों मानी जाती है शुभ

मान्यता है कि भगवान के रथ की रस्सी खींचने वाले भक्तों को विशेष पुण्य प्राप्त होता है। लाखों श्रद्धालु इस अवसर का इंतजार पूरे वर्ष करते हैं। ऐसा विश्वास है कि भगवान स्वयं अपने भक्तों को मोक्ष और सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इसी कारण रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

राजा भी निभाते हैं सेवक की भूमिका

रथ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान छेरा पहाड़ा कहलाता है। इसमें पुरी के गजपति महाराज सोने की झाड़ू से भगवान के रथ के आसपास प्रतीकात्मक सफाई करते हैं। यह परंपरा इस बात का संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं और राजा भी स्वयं को भगवान का सेवक मानता है। सालभर भगवान जगन्नाथ श्रीमंदिर के गर्भगृह में विराजमान रहते हैं जहां हर कोई प्रवेश नहीं कर सकता। लेकिन रथ यात्रा के दौरान भगवान स्वयं बाहर आते हैं ताकि सभी लोग बिना किसी भेदभाव के उनके दर्शन कर सकें। इसी कारण इसे जन जन की यात्रा भी कहा जाता है।

यात्रा से जुड़े रोचक तथ्य

जगन्नाथ रथ यात्रा का इतिहास कई सदियों पुराना माना जाता है। यह दुनिया के सबसे प्राचीन और विशाल रथ उत्सवों में शामिल है। भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे बड़ा होता है। लाखों श्रद्धालु एक साथ इसकी रस्सी खींचते हैं। यात्रा के दौरान पूरे पुरी शहर में भजन, कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। महाप्रसाद का वितरण भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

Jagannath Rath Yatra केवल धार्मिक नहीं सांस्कृतिक विरासत भी

यह आयोजन ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है। देश विदेश से आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक इस पर्व के माध्यम से भारतीय संस्कृति, परंपरा, शिल्पकला और आध्यात्मिक विरासत को करीब से देखते हैं। यूनेस्को स्तर पर भी इस परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के महत्वपूर्ण प्रतीकों में माना जाता है। रथ निर्माण से लेकर पूजा पद्धति तक हर परंपरा सदियों से सुरक्षित चली आ रही है।

आज से शुरू हुआ आस्था का महापर्व

आज 16 जुलाई से शुरू हुई Jagannath Rath Yatra 2026 के साथ पुरी पूरी तरह भक्तिमय वातावरण में डूब गया है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यह दिव्य यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था, सेवा, समानता और भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। हर वर्ष की तरह इस बार भी लाखों श्रद्धालु भगवान के रथ के दर्शन और उसे खींचने के लिए पुरी पहुंचे हैं। मान्यता है कि भगवान की इस यात्रा में श्रद्धा से शामिल होने वाले भक्तों पर उनकी विशेष कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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