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Reading: दिल्ली का दम घुट रहा है लेकिन दूसरे शहरों से सीख कर बदल सकती है स्थिति!
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India

दिल्ली का दम घुट रहा है लेकिन दूसरे शहरों से सीख कर बदल सकती है स्थिति!

दिल्ली हर साल ठंड के मौसम में एक जहरीले गैस चेंबर में बदल जाती है।

Last updated: फ़रवरी 25, 2025 12:33 अपराह्न
By Rajneesh 1 वर्ष पहले
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8 Min Read
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दिल्ली हर साल ठंड के मौसम में एक जहरीले गैस चेंबर में बदल जाती है। धुंध और धुएं की चादर शहर को ढक लेती है, और लोग खुली हवा में सांस लेने के लिए तरस जाते हैं। स्कूल बंद हो जाते हैं, बुजुर्ग और बीमार लोग घरों में कैद हो जाते हैं, और अस्पतालों में सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। गर्मी में तो हालात और बुरे हो जाते हैं। सवाल यह है कि क्या दिल्ली इस समस्या से निजात पा सकती है? इसका जवाब हां है…लेकिन अगर दिल्ली सही जगहों से सीखें सिर्फ तब!

दुनियाभर के कई शहर कभी दिल्ली की तरह प्रदूषण से जूझ रहे थे, लेकिन अब वे साफ हवा में सांस ले रहे हैं। भारत के ही कुछ शहरों ने बेहतर प्रबंधन करके प्रदूषण को नियंत्रित किया है। अगर दिल्ली इनसे प्रेरणा लेकर सही कदम उठाए, तो वह भी प्रदूषण से छुटकारा पा सकती है।

कैसे दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बीजिंग साफ हो गया?

2013 में बीजिंग दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था। वहां की हवा में PM 2.5 कण इतने ज्यादा थे कि लोग घरों से निकलने में डरते थे। चीन ने इस समस्या को हल करने के लिए एक सख्त और बहुआयामी रणनीति अपनाई, जिससे 2023 तक प्रदूषण का स्तर 60% तक कम हो गया। दिल्ली बीजिंग से क्या सीख सकती है?

बीजिंग ने कोयले से चलने वाले पावर प्लांट बंद कर दिए और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा दिया। दिल्ली को भी औद्योगिक उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण लगाने की जरूरत है। बीजिंग में कारों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए ऑड-ईवन सिस्टम को अपनाया गया, लेकिन इसे सख्ती से लागू किया गया। दिल्ली में यह प्रयोग सफल नहीं रहा, लेकिन बीजिंग ने सख्त कानूनों के साथ इसे प्रभावी बनाया। बीजिंग ने अपनी मेट्रो और इलेक्ट्रिक बसों का नेटवर्क बहुत तेजी से बढ़ाया, जिससे निजी वाहनों की संख्या कम हुई। दिल्ली को भी अपने पब्लिक ट्रांसपोर्ट को और मजबूत करना होगा। इसके अलावा बीजिंग ने शहरी जंगल विकसित किए, जिससे प्रदूषण अवशोषित करने में मदद मिली। दिल्ली को भी बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियानों की जरूरत है।

लंदन: कोयले से गैस चेंबर बना शहर कैसे बदला?

1952 में लंदन में ‘ग्रेट स्मॉग’ आया, जिसने 4,000 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। यह स्थिति दिल्ली की वर्तमान स्थिति से मिलती-जुलती थी। लंदन ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कई सख्त कदम उठाए। उन्होंने शहर के भीतर केवल कम-प्रदूषण वाले वाहनों को चलाने की अनुमति दी। दिल्ली को भी पॉल्यूशन कंट्रोल जोन बनाकर सख्त नियम लागू करने होंगे। लंदन ने कोयले पर प्रतिबंध लगाया और ग्रीन एनर्जी की तरफ शिफ्ट किया। दिल्ली में भी सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए। लंदन में साइक्लिंग लेन और पैदल चलने के लिए सुरक्षित रास्तों को विकसित किया गया। दिल्ली को भी कारों की निर्भरता कम करने के लिए ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना होगा।

सैन फ्रांसिस्को: शहर की मुख्य मार्केट स्ट्रीट पर कारों की एंट्री पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे साइक्लिंग को बढ़ावा मिला है। साथ ही, 125 मील लंबा साइक्लिंग लेन नेटवर्क विकसित किया गया है।​

बर्लिन: यहां 2008 से कम उत्सर्जन वाले क्षेत्र स्थापित किए गए हैं, जहां गैस और डीजल वाहनों पर रोक है। साथ ही, साइक्लिंग सुपर-हाइवे बनाए गए हैं, जिनमें 13 फीट चौड़ी लेन हैं, जहां कारों की अनुमति नहीं है।​

सिंगापुर: यहां गाड़ियों की संख्या पर कैपिंग है, जिससे वाहन खरीदना महंगा और कठिन है। सार्वजनिक परिवहन की उत्कृष्ट व्यवस्था के कारण लोग निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक साधनों का उपयोग करते हैं।​

ज्यादा दूर नहीं तो भारत को ही देख ले दिल्ली!

वाराणसी: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 2023-24 के स्वच्छ वायु सर्वेक्षण में वाराणसी ने पीएम 10 स्तर को 230 से घटाकर 73 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर कर लिया। यह सफलता धूल और गंदगी को नियंत्रित करने, स्मॉग गन के व्यापक उपयोग, और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने जैसे उपायों का परिणाम है।

सूरत: 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों में सूरत ने पहला स्थान प्राप्त किया है। यहां सार्वजनिक परिवहन में सुधार, औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण, और हरित क्षेत्रों के विस्तार जैसे कदम उठाए गए हैं।​

आज मुंबई भी दिल्ली से कम प्रदूषित है क्योंकि वहां समुद्री हवाएं लगातार हवा को साफ करती हैं। लेकिन मुंबई ने भी कुछ अहम कदम उठाए हैं, जैसे कि निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और हरित पट्टियों का निर्माण। दिल्ली को भी अपनी निर्माण गतिविधियों को रेगुलेट करना होगा और ‘ग्रीन बैरियर्स’ विकसित करने होंगे।

उसी तरह चेन्नई में शहरी वनों को संरक्षित किया गया है, जिससे प्रदूषण कम हुआ है। दिल्ली को भी अपने बचे हुए जंगलों, जैसे कि अरावली और संजय वन, को बचाने और बढ़ाने की जरूरत है।

वहीं हैदराबाद में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने भारी सब्सिडी दी है। दिल्ली को भी इसी मॉडल पर चलकर इलेक्ट्रिक वाहनों को मुख्यधारा में लाना होगा।

दिल्ली के लिए ठोस समाधान

अब सवाल उठता है कि दिल्ली अपनी वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए क्या कर सकती है? यहां कुछ ठोस कदम दिए गए हैं, जो दिल्ली को अन्य शहरों से सीखकर उठाने चाहिए। सबसे पहले तो दिल्ली को सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाना होगा जो आप की सरकार में थका हुआ है। मेट्रो के विस्तार को और तेज किया जाए। इलेक्ट्रिक बसों और क्लीन फ्यूल वाहनों को बढ़ावा दिया जाए। साइक्लिंग और पैदल यात्रा को सुविधाजनक बनाया जाए।

दूसरा सुझाव सख्त वाहन नियम लागू करने से जुड़ा है। वहां पुरानी डीजल और पेट्रोल गाड़ियों को धीरे-धीरे हटाया जाए। सिर्फ CNG और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दी जाए। लंदन की तरह ‘लो एमिशन जोन’ बनाए जाएं।

तीसरा समाधान धूल और कचरे के नियंत्रण से जुड़ा है। निर्माण स्थलों पर कड़ी निगरानी रखी जाए। कचरा जलाने पर सख्त प्रतिबंध लगाया जाए। पराली जलाने की समस्या को हल करने के लिए किसानों को सस्ते विकल्प दिए जाएं।

इसके अलावा औद्योगिक उत्सर्जन पर नियंत्रण और ग्रीन जोन बनाने होंगे। ग्रीन टेक्नोलॉजी को अपनाने के लिए कंपनियों को इंसेंटिव दिए जाएं।

दिल्ली को साफ करने के लिए केवल सरकारी प्रयास ही नहीं, बल्कि नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। अगर सरकार सख्त नियम लागू करे, लोग जागरूक होकर प्रदूषण नियंत्रण में योगदान दें, और दिल्ली अन्य शहरों की सफलता की कहानियों से सीख ले, तो यह शहर एक बार फिर सांस लेने लायक बन सकता है। समस्या बड़ी है, लेकिन समाधान नामुमकिन नहीं। बीजिंग, लंदन, सूरत सही कई जगहों ने यह कर दिखाया है अब दिल्ली की बारी है!

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